मेरी ज़िंदगी का आलम इतना गहरा था

 मेरी ज़िंदगी का आलम इतना गहरा था…

मेरी ज़िंदगी का आलम इतना गहरा था,
ना दिल की चोट दिखी, ना रूह के ज़ख़्म।
बस होंठ मुस्कुराए तो लोगों ने समझ लिया,
कि शायद हर दर्द हो गया ख़त्म।

अंदर तूफ़ान थे, खामोशियाँ चीख़ती रहीं,
हर रात आँसुओं से भीगी तक़दीर रही।
पर दुनिया को क्या खबर थी मेरी तन्हाई की,
मैं हँसती रही, और टूटता रहा धीरे-धीरे कहीं।

हर सवाल का जवाब बस मुस्कान बनी,
हर शिकायत दिल में ही दफ़न रही।
मैंने सीखा है जीना नक़ाब पहन कर,
क्योंकि मेरी सच्चाई सिर्फ़ मेरी रही… 💔

Comments

Popular posts from this blog

मोहब्बत या ज़रूरत

बेबसी का आलम

तेरी याद