हँसती रही
हँसती रही मैं हर दर्द छुपाकर, टूटे ख्वाबों को दिल में दबाकर। लोगों ने पूछा, “सब ठीक तो है?” मैंने झूठी मुस्कान से कहा, “हाँ…” हँसती रही अपने हालातों पर, अपनी ही तक़दीर की बातों पर। रोना चाहा तो रातों ने सुना, दिन में तो बस मैं हँसती रही। हर किसी के लिए मजबूत बनी रही, खुद के लिए कमजोर पड़ती रही। दुनिया ने मेरी हँसी देखी बस, मेरी खामोशी कोई न पढ़ सकी। हँसती रही… क्योंकि रोने से भी, अब कोई फर्क पड़ता नहीं था… 💔